ऋषिकेश में हुआ “भारतीय संपादक परिषद” का गठन

राष्ट्रीय कमेटी घोषित, योगेश भारद्वाज राष्ट्रीय अध्यक्ष और पंकज धीरज राष्ट्रीय महासचिव बने

तीन राज्यों के अध्यक्ष घोषित, सरकार और तंत्र तक पहुंचेगी संपादकों की समस्याओं की आवाज

ऋषिकेश, डॉ. विवेक कुमार त्रिपाठी। पत्रकारों के अधिकारों और समस्याओं को लेकर देश में विभिन्न संगठन सक्रिय हैं, लेकिन मीडिया संस्थानों की दिशा और दशा तय करने वाले संपादकों की समस्याओं और अधिकारों के लिए एक व्यापक एवं संगठित मंच का अभाव लंबे समय से महसूस किया जा रहा था। इसी आवश्यकता को पूरा करने की दिशा में “भारतीय संपादक परिषद” के गठन के साथ एक नए अध्याय की शुरुआत हुई है।

ऋषिकेश स्थित श्री वृंदावन रिसोर्ट में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार के दौरान भारतीय संपादक परिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का गठन किया गया। कार्यक्रम में उत्तराखंड सरकार के मंत्री, न्यायिक अधिकारी, दिल्ली के विधायक सहित विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े गणमान्य लोग उपस्थित रहे।


अब संपादक अकेला नहीं, संगठन के साथ उठेगी आवाज

मीडिया संस्थानों का संचालन करने वाले संपादकों के सामने समाचार प्रकाशन से लेकर प्रशासनिक दबाव, विज्ञापन व्यवस्था, पत्रकारिता की स्वतंत्रता, संस्थागत चुनौतियों तथा तेजी से बदलते मीडिया परिवेश जैसी अनेक चुनौतियां हैं। इसके बावजूद संपादकों की सामूहिक समस्याओं और अधिकारों को प्रभावी ढंग से सरकार एवं संबंधित तंत्र तक पहुंचाने वाला व्यापक राष्ट्रीय मंच अब तक नजर नहीं आता था।

भारतीय संपादक परिषद इसी कमी को दूर करने की पहल है। परिषद का उद्देश्य देशभर के संपादकों को एक साझा मंच उपलब्ध कराना तथा पत्रकारिता एवं संपादकीय स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों पर उनकी आवाज को मजबूती से उठाना बताया गया है।

राष्ट्रीय सेमिनार के दौरान परिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की घोषणा की गई। योगेश भारद्वाज को राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा पंकज धीरज को राष्ट्रीय महासचिव की जिम्मेदारी सौंपी गई। वहीं तिशा वार्ष्णेय को राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष और डॉ. विवेक कुमार त्रिपाठी को राष्ट्रीय सचिव बनाया गया।

इसी क्रम में बलराम शर्मा को हरियाणा प्रदेश अध्यक्ष, जितेंद्र वार्ष्णेय को पश्चिमी उत्तर प्रदेश अध्यक्ष तथा संजीव शर्मा को पश्चिमी उत्तर प्रदेश महासचिव घोषित किया गया।

परिषद के विस्तार के लिए अन्य पदाधिकारियों एवं विभिन्न समितियों के गठन की दिशा में भी आगामी रणनीति तैयार की जाएगी।

पत्रकारिता के साथ संपादकीय नेतृत्व के अधिकारों की लड़ाई भी जरूरी

भारतीय संपादक परिषद का गठन ऐसे समय में हुआ है, जब मीडिया जगत तेजी से बदलाव के दौर से गुजर रहा है। डिजिटल मीडिया, सोशल मीडिया, तकनीकी परिवर्तन और बदलती आर्थिक परिस्थितियों ने संपादक की भूमिका को पहले से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण बना दिया है।

ऐसे दौर में केवल पत्रकारों की समस्याओं पर चर्चा पर्याप्त नहीं है, बल्कि मीडिया संस्थानों की नीति, संपादकीय स्वतंत्रता, संपादकों के अधिकार और उनके सामने आने वाली संस्थागत एवं कानूनी चुनौतियों पर भी गंभीरता से विमर्श आवश्यक है।

परिषद के गठन से यह उम्मीद जगी है कि संपादकों की समस्याएं अब अलग-अलग स्तरों पर दबे स्वर में नहीं, बल्कि एक संगठित राष्ट्रीय मंच के माध्यम से सरकार, प्रशासन और मीडिया तंत्र तक प्रभावी ढंग से पहुंचेंगी।

भारतीय संपादक परिषद का यह गठन केवल पदाधिकारियों की घोषणा नहीं, बल्कि देशभर के संपादकों की सामूहिक आवाज को एक संगठित पहचान और प्रभावी मंच देने की पहल के रूप में देखा जा रहा है।

पूर्व न्यायाधीश जस्टिस राजेश टंडन की देखरेख में लड़ी जाएगी संपादकों के अधिकारों की कानूनी लड़ाई

ऋषिकेश। भारतीय संपादक परिषद के राष्ट्रीय गठन के दौरान उत्तराखंड हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस राजेश टंडन को परिषद का मुख्य संरक्षक बनाया गया है। परिषद की ओर से बताया गया कि उनके व्यापक विधिक अनुभव और मार्गदर्शन से संगठन को मजबूती मिलेगी।

परिषद के पदाधिकारियों के अनुसार, संपादकों और मीडिया संस्थानों से जुड़े अधिकारों, विधिक चुनौतियों तथा विभिन्न कानूनी मामलों में जस्टिस राजेश टंडन के मार्गदर्शन एवं देखरेख में कानूनी लड़ाई लड़ी जाएगी।

उनके मुख्य संरक्षक बनने से परिषद को विधिक स्तर पर एक मजबूत आधार मिलने की उम्मीद जताई गई है। परिषद का मानना है कि संपादकीय स्वतंत्रता, मीडिया संस्थानों के अधिकार और संपादकों से जुड़े कानूनी विषयों पर अनुभवी न्यायिक मार्गदर्शन संगठन के प्रयासों को नई दिशा प्रदान करेगा।

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