विकास की अंधी दौड़ और पहाड़ की देह पर मजदूरों की चिता

रीना सैन 

उत्तराखंड के चमोली जिले के पीपलकोटी में निर्माणाधीन हाइड्रो प्रोजेक्ट की टनल में हुआ हादसा केवल एक प्राकृतिक या तकनीकी विफलता नहीं है, बल्कि यह हमारे अंधाधुंध विकास मॉडल पर एक तीखा मानवीय प्रश्नचिह्न है। गुरुवार शाम टनल के भीतर घुसा मलबा और पानी अपने साथ सात जिंदगियों को बहा ले गया, जबकि तीन मजदूर अब भी मलबे की उस अंधेरी दुनिया में फंसे हैं। जब भी पहाड़ों का सीना चीरकर आधुनिकता की नई इबारत लिखने की कोशिश होती है, उसकी सबसे पहली और भारी कीमत उन गुमनाम मजदूरों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है, जिनके कंधों पर यह पूरा ढांचा खड़ा होता है।

पहाड़ों की नाजुक भूगर्भीय संरचना और बार-बार आते आपदा के संकेत यह साफ बताते हैं कि हिमालय की धारक क्षमता (Carrying Capacity) सीमित है। इसके बावजूद बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में आधुनिक सुरक्षा मानकों, पूर्व-चेतावनी प्रणालियों (Early Warning Systems) और सुरक्षित निकासी मार्गों (Emergency Escape Routes) की घोर उपेक्षा की जाती है। जब भी कोई हादसा होता है, राज्य मशीनरी हरकत में आती है, राहत और बचाव दल (NDRF/SDRF) अपनी जान जोखिम में डालकर जिंदगियां बचाने उतरते हैं, और कुछ ही दिनों में मुआवजे की घोषणाओं के साथ पूरी फाइल बंद कर दी जाती है।

असली सवाल मुआवजे या तात्कालिक राहत का नहीं, बल्कि व्यवस्थागत जवाबदेही का है। क्या बड़ी परियोजना कंपनियों के लिए सुरक्षा केवल कागजी औपचारिकता है? संसद के गलियारों से लेकर सरकारी दफ्तरों तक विकास के बड़े दावों के बीच यह विचार जरूरी है कि जिस विकास की नींव में मजदूरों का खून और बेबसी दबी हो, वह समाज को किस दिशा में ले जा रहा है। जब तक निर्माण प्रक्रिया में पर्यावरण संतुलन, स्वतंत्र सुरक्षा ऑडिट और कंपनियों की सीधी आपराधिक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऐसी सुरंगें आधुनिकता के रास्ते नहीं, बल्कि इंसानी जिंदगियों की कब्रगाह बनती रहेंगी।

(लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं) 

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