नाम बदला, उम्मीदें नहीं बदलीं

सुबह के आठ बजे हैं। बिहार के मुजफ्फरपुर जिला स्थित मुसहरी प्रखंड के दूर-दराज़ सितुआरा गांव की गलियों में चूल्हों से उठता धुआँ अभी पूरी तरह आसमान में घुला भी नहीं है कि कई घरों में दिनभर की हलचल और चिंताएं शुरू हो जाती है। कोई खेत पर दिहाड़ी मिलने की आस में निकलता है, तो कोई इस उम्मीद के साथ पंचायत भवन का रुख करता है कि शायद उसे वीबी-जी राम जी योजना के तहत आज काम मिल जाए। गांव की कुछ महिलाएं अपने पुराने आवेदन पत्रों को संभालकर रखती हैं, जैसे उन्हें यकीन है कि एक दिन रोजगार के लिए उनका नाम भी पुकारा जाएगा।


सितुआरा गांव के करीब 400 से अधिक घरों में रहने वाले अधिकांश परिवार अनुसूचित जाति, ओबीसी और अल्पसंख्यक समुदाय से हैं। यहां लोगों की जिंदगी रोज कमाने और रोज खाने के सहारे चलती है। ऐसे में यदि एक दिन भी मजदूरी न मिले, तो शाम का चूल्हा जलाने तक की चिंता परिवारों को घेर लेती है। इन परिवारों के लिए मनरेगा यानी वीबी-जी राम जी योजना ही रोजगार का सबसे बड़ा माध्यम है। लेकिन गांव की कई महिलाएं ऐसी हैं जिनका आज तक इस योजना में नाम नहीं जुड़ सका है, जिससे उन्हें रोजगार हासिल नहीं हो पाता है। यदि जिन्हें रोजगार मिल भी जाता है तो समय पर उनका भुगतान नहीं होता है।

गांव की 38 वर्षीय रीता देवी के पास पंचायत में जमा किए गए आवेदन की रसीद है। वह बताती हैं कि उन्होंने कई बार रोजगार के लिए आवेदन दिया, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। वह
कहती हैं "हर बार पंचायत से यही कहा जाता है कि अगली बार नाम जोड़ दिया जाएगा। लेकिन वह बाद कब आएगा, यह कोई नहीं बताता,"। उनके घर की आर्थिक स्थिति ऐसी है कि यदि लगातार कुछ दिन मजदूरी न मिले, तो परिवार को उधार का सहारा लेना पड़ता है।

वहीं 36 साल की ललिता देवी की परेशानी अलग है। उनकी सास का नाम रोजगार सूची में दर्ज है, लेकिन उम्र और बीमारी के कारण वह अब काम करने में सक्षम नहीं हैं। ललिता चाहती हैं कि परिवार में काम करने वाली सदस्य होने के कारण उनका नाम दर्ज कर लिया जाए। वह कहती हैं, "मैं मनरेगा के तहत काम करने के लिए तैयार हूं, लेकिन सूची में नाम नहीं होने से काम नहीं मिलता। सास का नाम है, लेकिन वह अब काम नहीं कर सकतीं।"

उधर उमा देवी का नाम सूची में है और उन्हें समय-समय पर काम भी मिलता है। लेकिन उनकी शिकायत भुगतान को लेकर है। वह कहती हैं, "मजदूरी समय पर नहीं मिलती। पैसा देर से आता है तो घर चलाना मुश्किल हो जाता है। बच्चों की पढ़ाई, राशन और दवा सब प्रभावित होता है। हम चाहते हैं कि हर मजदूर को समय पर पैसा मिले ताकि उसके घर का चूल्हा बुझने न पाए।" उमा देवी की बात सुनते समय उनके आंगन में खेल रहे बच्चों की तरफ नजर जाती है। एक बच्चा मिट्टी से खेलते हुए अपनी मां की ओर देखता है। शायद उसे यह नहीं मालूम कि उसकी मां की सबसे बड़ी चिंता अगले दिन के खाने की है।

ग्रामीण गरीबों के लिए वर्षों से सबसे बड़ा सहारा रही मनरेगा योजना अब "विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण)" यानी वीबी-जी राम जी योजना के नाम से जानी जा रही है। केंद्र सरकार ने इसके तहत रोजगार की गारंटी को 100 दिनों से बढ़ाकर 125 दिन करने, कौशल विकास, ग्रामीण परिसंपत्तियों के निर्माण और डिजिटल निगरानी जैसी नई व्यवस्थाओं को शामिल करने की बात कही है। सरकार का दावा है कि इससे ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ेगी और रोजगार के अवसर मजबूत होंगे।

लेकिन सितुआरा गांव की कई महिलाओं के लिए नाम बदलने से ज्यादा अहम सवाल यह है कि जब उनका नाम ही रोजगार सूची में नहीं जुड़ा, तो अतिरिक्त 25 दिनों के रोजगार का लाभ उन्हें कैसे मिलेगा? गांव की रानी कुमारी इस सवाल के साथ कई वर्षों से पंचायत कार्यालय के चक्कर लगा रही हैं। उनके हाथों की दरारें और चेहरे पर उभरी थकान बताती है कि उन्होंने मजदूरी की कमी को कितनी नजदीक से महसूस किया है।

रानी कहती हैं, "कई बार नाम जुड़वाने का प्रयास किया। पहले मनरेगा था, अब उसका नाम बदल गया, लेकिन हमारे लिए कुछ नहीं बदला। आज भी सूची में नाम नहीं है।" उनकी आवाज में शिकायत कम और थकान ज्यादा महसूस होती है। उन्हें उम्मीद थी कि नई योजना के साथ शायद पुराने आवेदन भी देखे जाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अब वे कभी-कभी दूसरे गांवों में दिहाड़ी तलाशने निकल जाती हैं।

सरकार द्वारा घोषित नई व्यवस्था में भले ही रोजगार की अवधि बढ़ा दी गई है और इस काम में पारदर्शिता भी लाई गई है लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी योजना की सफलता इस बात से तय होती है कि उसका लाभ सबसे कमजोर व्यक्ति तक पहुंच रहा है या नहीं? यदि पात्र परिवारों का नाम सूची में शामिल नहीं होगा या मजदूरी का भुगतान समय पर नहीं होगा, तो रोजगार की गारंटी कागजों तक सीमित मानी जाएगी। दरअसल किसी योजना का नाम बदल देने या रोजगार के दिनों की संख्या बढ़ा देने अथवा नई सुविधाओं को जोड़ देने मात्र से ही बदलाव मुमकिन नहीं है बल्कि असली बदलाव उस दिन होगा, जब पंचायत भवन के बाहर आवेदन लेकर खड़े ग्रामीणों को यह भरोसा मिलेगा कि उनका नाम सूची में दर्ज होगा, उन्हें काम मिलेगा और उनकी मजदूरी समय पर उनके खाते में पहुंचेगी।
(यह लेखिका के निजी विचार हैं)


प्रीति कुमारी

मुजफ्फरपुर, बिहार


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