दोहे (होली पर्व)

रंगन के त्योहार में मचा रहे सब भंग ।
करनी अपनी देख के, काहे तुम हो दंग ।।

काले मन को धो ज़रा, श्याम को ले बसाय ।
कान्हा जी की सीख में,  असली रंग समाय।। 

रंग बना ले प्रेम का, भर वाणी से डार ।
डूब प्रेम के रंग में, सँवरे सब संसार ।।

कर होलिका दहन सबै, रीत-रिवाज निभाय ।
भीतर को विष जार कें, जग खौं लियो बचाय ।।

 जौं लौं अपनी सोच सें, काड़त नाहीं वार ।
झूठे रंग बिखेर के, पाओ आर न पार ।।

छल-छल कें सब छल गयो,रीते दोई हात ।
प्रेम रंग खौं छांड़ि के, सब पीछे पछतात ।।

अबकी होली यूँ मना, बनें सभी जन नेक ।
 मिलन कहे सब भूल जा, रंग  रक्त कौ एक ।।   

भावना अरोड़ा 'मिलन'
अध्यापिका, लेखिका, मोटिवेशनल स्पीकर 
कालकाजी, नई दिल्ली



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