रंगन के त्योहार में मचा रहे सब भंग ।
करनी अपनी देख के, काहे तुम हो दंग ।।
काले मन को धो ज़रा, श्याम को ले बसाय ।
कान्हा जी की सीख में, असली रंग समाय।।
रंग बना ले प्रेम का, भर वाणी से डार ।
डूब प्रेम के रंग में, सँवरे सब संसार ।।
कर होलिका दहन सबै, रीत-रिवाज निभाय ।
भीतर को विष जार कें, जग खौं लियो बचाय ।।
जौं लौं अपनी सोच सें, काड़त नाहीं वार ।
झूठे रंग बिखेर के, पाओ आर न पार ।।
छल-छल कें सब छल गयो,रीते दोई हात ।
प्रेम रंग खौं छांड़ि के, सब पीछे पछतात ।।
अबकी होली यूँ मना, बनें सभी जन नेक ।
मिलन कहे सब भूल जा, रंग रक्त कौ एक ।।
