पुस्तक समीक्षा स्त्री : इक्कीस आयाम

कुमुद सिन्हा प्रियदर्शी की संवेदनशील कविता-संग्रह

समीक्षक: डॉ नीरज कुमार वर्मा 

नई दिल्ली। स्त्री-जीवन की विविधता, संघर्ष, त्याग और शक्ति को कोमल शब्दों में उतारने वाली एक नई कृति सामने आई है। कुमुद सिन्हा प्रियदर्शी की पुस्तक स्त्री : इक्कीस आयाम — हर भूमिका में एक नई पहचान” पाठकों के हृदय को स्पर्श करती हुई स्त्री-स्वरूप के इक्कीस अलग-अलग रंगों को उजागर करती है। BookLeaf Publishing द्वारा प्रकाशित यह कविता-संग्रह लेखिका की पहली पुस्तक है, जो घर संभालने वाली आम महिलाओं की अनकही आवाज़ को सशक्त अभिव्यक्ति देती है।


पुस्तक का समर्पण माता-पिता और पति को है, जो लेखिका की भावुकता को दर्शाता है। प्रस्तावना में कुमुद जी लिखती हैं कि घर की जिम्मेदारियों में खो जाने वाली महिलाओं को अपनी पहचान वापस दिलाने का यह एक प्रयास है। पुस्तक में ठीक 21 कविताएँ हैं, जो स्त्री के विभिन्न रूपों — औरत, गृहिणी, बेटी, बहू, माँ, कामकाजी, नर्स, कामवाली से लेकर पौराणिक चरित्रों जैसे उर्मिला, यशोधरा, पार्वती, चित्रांगदा और काली तक — को समर्पित हैं।

कविताओं का सार और प्रभाव

संग्रह की शुरुआत कविता औरत” से होती है, जिसमें लेखिका स्त्री की सरल इच्छा को व्यक्त करती हैं — “बस इतनी-सी ख्वाहिश… खुश हूँ, गर मुझे मेरी तरह जीने की मोहलत मिलती है।” यह पंक्ति आज के समय की स्त्री की बुनियादी आकांक्षा को बहुत सटीक ढंग से पकड़ती है।

बेटियाँ” में “पराई” वाली पुरानी सोच पर सशक्त प्रहार है। पुत्रवधू” बहू को सम्मान और जगह देने की अपील करती है। कामकाजी” और कामवाली” दोहरी जिम्मेदारी और वर्गीय संवेदना को छूती हैं। सखियां” आधुनिक मित्रता का हल्का-फुल्का लेकिन सच्चा चित्रण प्रस्तुत करती है।

पौराणिक कविताएँ पुस्तक की जान हैं। उर्मिला”, “यशोधरा” और माद्री” जैसी कविताओं में उपेक्षित स्त्री-चरित्रों को केंद्र में लाकर लेखिका ने महाकाव्यों की खामोशी को तोड़ा है। काली” में स्त्री की सहनशीलता की सीमा पार होने पर जागृत होने वाली अदम्य शक्ति का चित्रण अत्यंत प्रभावशाली है। नवदुर्गा” और पार्वती” में शक्ति और सृजन के रूपों को सुंदर ढंग से गूंथा गया है। अंतिम कविता लक्ष्मी” घर की स्त्री का अपमान न करने का गहरा नैतिक संदेश देती है।

काव्य शैली

कुमुद सिन्हा प्रियदर्शी की भाषा सरल, सहज और भावपूर्ण है। छंद-मुक्त कविताएँ लयबद्ध हैं, जिससे पठनीयता बनी रहती है। उन्होंने प्रतीकों (दुर्गा, काली, लक्ष्मी, सरस्वती) का कुशलतापूर्वक प्रयोग किया है। कुछ कविताओं में आधुनिक संदर्भ और हल्का व्यंग्य पुस्तक को समसामयिक बनाता है। भावुकता और बौद्धिकता का संतुलन पुस्तक की सबसे बड़ी ताकत है।

महत्व

स्त्री: इक्कीस आयाम” केवल कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि स्त्री-चेतना का दस्तावेज़ है। यह न तो स्त्री को देवी बनाती है और न शिकार, बल्कि उसे पूर्ण मानवी के रूप में चित्रित करती है — अपनी कमजोरियों, शक्तियों, संघर्षों और उपलब्धियों के साथ। आज के बदलते सामाजिक परिदृश्य में यह पुस्तक पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए समान रूप से प्रासंगिक है।

कुमुद सिन्हा प्रियदर्शी का यह प्रथम प्रयास स्त्री-लेखन की दिशा में एक सार्थक कदम है। पुस्तक पाठकों को सोचने पर मजबूर करती है और स्त्री के प्रति सम्मान की भावना को प्रबल बनाती है।

रेटिंग : 4.5/5

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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