विवेक शुक्ला
उत्तर प्रदेश के बागपत जिले
की पहचान अब तक मुख्य रूप से गन्ने के खेतों और मीठे आमों के लिए ही रही है। पर अब
बागपत अपनी पारंपरिक मिठाइयों के लिए विश्व व्यापी पहचान बनाने के
लिए बेकरार है। यहां की बालूशाही और छूआरे के लड्डू न केवल स्थानीय लोगों की पसंदीदा
मिठाइयां हैं, बल्कि पूरे देश में
अपनी अनोखी स्वाद और गुणवत्ता के लिए मशहूर हैं। हाल ही में, इन मिठाइयों को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग दिलाने की प्रक्रिया शुरू हुई है।
सबसे पहले GI टैग को समझते हैं। भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication) एक ऐसा प्रमाणन है जो किसी उत्पाद को उसके विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र से जोड़ता है। यह टैग उस उत्पाद की गुणवत्ता, प्रतिष्ठा और विशेषताओं को प्रमाणित करता है, जो उस क्षेत्र की मिट्टी, जलवायु, पारंपरिक विधियों या सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी होती हैं। भारत में GI टैग की व्यवस्था 1999 के भौगोलिक संकेतक (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम के तहत की गई है, जो विश्व व्यापार संगठन (WTO) के समझौते से प्रेरित है। GI टैग मिलने से उत्पाद की नकल रोकने में मदद मिलती है और यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी पहचान बनाता है। उदाहरण के लिए, दार्जिलिंग चाय, बनारसी साड़ी या मैसूर पाक जैसे उत्पादों को GI टैग मिल चुका है, जिससे उनकी बाजार मूल्य और मांग बढ़ी है। बागपत जिले की जिलाधिकारी श्रीमती अस्मिता लाल (आईएएस) चाहती हैं कि उनके जिलों की बालशाही और लड्डू को जल्दी से जल्दी GI टैग मिल जाए। यह पहल न केवल इन उत्पादों की रक्षा करेगी, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूत बनाएगी।
बागपत की बालूशाही और छूआरे
के लड्डू का इतिहास सदियों पुराना है। बागपत, जो
दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के पश्चिमी भाग में स्थित है, अपनी कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था के लिए प्रसिद्ध है।
यहां की बालूशाही एक पारंपरिक मिठाई है,
जो
मैदा, घी और चीनी से बनाई जाती है।
इसकी विशेषता है इसकी कुरकुरी परत और अंदर की नरम, मीठी भरावन। स्थानीय कारीगर बताते हैं कि बागपत की बालूशाही
की अनोखी स्वाद यहां की मिट्टी में उगने वाले गेहूं और स्थानीय घी से आती है। यह
मिठाई त्योहारों, शादियों और दैनिक
जीवन में अहम भूमिका निभाती है। इसी तरह, छूआरे
के लड्डू खजूर (छूआरा) से बने होते हैं,
जो
सूखे मेवों, घी और मसालों से
तैयार किए जाते हैं। बागपत क्षेत्र में उगने वाले खजूर की किस्में विशेष हैं, जो इन लड्डुओं को पौष्टिक और स्वादिष्ट बनाती हैं।
ये मिठाइयां न केवल
स्वास्थ्यवर्धक हैं, बल्कि स्थानीय
कारीगरों की पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही कला का प्रतिनिधित्व करती हैं। हालांकि, बाजार में नकली उत्पादों की बाढ़ से इनकी असली पहचान
खतरे में है, जिससे GI टैग की आवश्यकता पड़ी।
अब बात करते हैं इस मामले
की। बागपत की इन मिठाइयों को GI टैग दिलाने की प्रक्रिया चल रही है। यह पहल स्थानीय प्रशासन, कारीगर संघों और राज्य सरकार के सहयोग से हो रही है।
जिलाधिकारी श्रीमती अस्मिता लाल, जो 2015 बैच की
आईएएस अधिकारी हैं, इस अभियान की अगुवाई
कर रही हैं। अस्मिता लाल बागपत की 31वीं जिलाधिकारी हैं और उन्होंने पहले भी लड़की
शिक्षा, मातृ स्वास्थ्य, खुले में शौच मुक्त गांव और पशु कल्याण जैसे
क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य किया है। हाल ही में, उन्होंने ऑर्गन डोनेशन की मुहिम चलाई, जिसमें खुद अपनी आंखें दान करने का संकल्प लिया। GI टैग के संदर्भ में, उन्होंने स्थानीय मिठाई उत्पादकों से मिलकर आवेदन प्रक्रिया
शुरू की। प्रक्रिया में सबसे पहले उत्पाद की विशेषताओं का दस्तावेजीकरण होता है, जिसमें ऐतिहासिक प्रमाण, भौगोलिक संबंध और उत्पादन विधियों का विवरण शामिल है।
इसके बाद, GI रजिस्ट्री, चेन्नई में आवेदन दाखिल किया जाता है, जहां विशेषज्ञ समिति जांच करती है। अगर स्वीकृत हो, तो टैग मिलता है।
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| जिलाधिकारी श्रीमती अस्मिता लाल |
अस्मिता लाल ने इस प्रक्रिया
को तेज करने के लिए कार्यशालाएं आयोजित कीं, जहां
कारीगरों को GI के महत्व के बारे
में जागरूक किया गया। उन्होंने सरकारी विभागों से समन्वय स्थापित कर दस्तावेज
तैयार करवाए। यह प्रयास स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने का हिस्सा है, क्योंकि बागपत में हजारों परिवार इन मिठाइयों के
उत्पादन से जुड़े हैं।
GI
टैग
मिलने से क्या लाभ होंगे? यह सवाल महत्वपूर्ण
है, क्योंकि GI टैग केवल एक लेबल नहीं, बल्कि आर्थिक और सांस्कृतिक संरक्षण का माध्यम है।
सबसे बड़ा लाभ उत्पाद की प्रामाणिकता की रक्षा है। GI टैग से नकली उत्पादों पर रोक लगती है, जिससे असली उत्पादकों को उचित मूल्य मिलता है। एक अध्ययन
के अनुसार, GI टैग वाले उत्पादों
की कीमत 20-50% तक बढ़ जाती है, क्योंकि उपभोक्ता
प्रामाणिकता के लिए अधिक भुगतान करने को तैयार होते हैं। उदाहरण के लिए, बनारसी साड़ी को GI मिलने के बाद उसकी अंतरराष्ट्रीय मांग बढ़ी और कारीगरों
की आय दोगुनी हुई। इसी तरह, बागपत की मिठाइयों
के लिए GI टैग से स्थानीय
कारीगरों को बाजार विस्तार मिलेगा। वे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स और निर्यात के माध्यम
से उत्पाद बेच सकेंगे, जिससे रोजगार
बढ़ेगा। सांस्कृतिक रूप से, GI टैग पारंपरिक ज्ञान
की रक्षा करता है। यह सुनिश्चित करता है कि उत्पादन विधियां पीढ़ियों तक बनी रहें, और जलवायु परिवर्तन या जैव विविधता हानि जैसे चुनौतियों
से निपटने में मदद करता है। आर्थिक रूप से, GI टैग से पर्यटन बढ़ता है, क्योंकि
लोग GI उत्पादों के मूल
स्थानों का दौरा करते हैं। बागपत जैसे ग्रामीण क्षेत्र में यह स्थानीय व्यापार को
प्रोत्साहित करेगा। इसके अलावा, GI टैग से कानूनी
सुरक्षा मिलती है, जो अनधिकृत उपयोग पर
मुकदमे की अनुमति देता है। भारत में GI
टैग
वाले उत्पादों की संख्या 400 से अधिक हो चुकी है, और प्रत्येक से जुड़े समुदायों को सशक्तिकरण मिला है।
GI टैग से किसानों और कारीगरों
को उचित मूल्य मिलता है, मध्यस्थों की भूमिका
कम होती है और लाभ सीधे उत्पादकों तक पहुंचता है। जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में, GI टैग स्थानीय जैव विविधता की रक्षा करता है, जैसे बागपत के खजूर की किस्मों को। कुल मिलाकर, GI टैग सतत विकास का माध्यम है, जो सांस्कृतिक विरासत को आर्थिक लाभ से जोड़ता है।
इस प्रक्रिया में चुनौतियां
भी हैं। आवेदन प्रक्रिया जटिल है, जिसमें दस्तावेजीकरण
और जांच में समय लगता है। स्थानीय कारीगरों में जागरूकता की कमी हो सकती है, जिसे अस्मिता लाल जैसे अधिकारियों की पहल से दूर किया
जा रहा है। राज्य सरकार का समर्थन भी जरूरी है, ताकि GI
मिलने
के बाद उत्पादों का प्रचार हो। निष्कर्ष में, बागपत
की बालूशाही और छूआरे के लड्डू को GI
टैग
मिलना एक मील का पत्थर होगा। यह न केवल इन मिठाइयों की पहचान मजबूत करेगा, बल्कि स्थानीय समुदाय को आत्मनिर्भर बनाएगा। अस्मिता लाल
की सक्रियता इस दिशा में प्रेरणादायक है, जो
दिखाती है कि प्रशासनिक प्रयास कैसे सांस्कृतिक संरक्षण में योगदान दे सकते हैं। GI टैग से भारत की विविधता की रक्षा होती है, और बागपत जैसे छोटे जिलों को वैश्विक मंच मिलता है। उम्मीद
है कि जल्द ही ये मिठाइयां GI टैग के साथ चमकेंगी, और स्थानीय अर्थव्यवस्था नई ऊंचाइयों को छुएगी।

