नई दिल्ली। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के प्रस्तावित नए बिल और नियमों को लेकर देश के शैक्षणिक और कानूनी गलियारों में हलचल तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट के युवा अधिवक्ता सिद्धार्थ सिंह ने इस विधेयक को भारतीय शिक्षा व्यवस्था और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए "गंभीर रूप से हानिकारक" करार देते हुए इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने केंद्र सरकार से इस विधेयक को तत्काल वापस लेने की पुरजोर मांग की है।
अधिवक्ता सिद्धार्थ सिंह का तर्क है कि यह बिल केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं है, बल्कि इसका सीधा और गहरा असर देश के करोड़ों बच्चों और युवाओं के भविष्य पर पड़ेगा। उनके अनुसार, जिस तरह से इस बिल को लाया जा रहा है, वह प्रक्रिया ही लोकतांत्रिक मर्यादाओं के उल्लंघन की ओर इशारा करती है।
संवाद का अभाव और लोकतांत्रिक चिंताएं
सिद्धार्थ सिंह ने इस बात पर गहरा असंतोष व्यक्त किया कि इतने संवेदनशील और महत्वपूर्ण विषय पर कोई व्यापक संसदीय चर्चा नहीं की गई। उन्होंने कहा, "समाज के विभिन्न वर्गों, शिक्षाविदों और हितधारकों की सहमति के बिना इस तरह के बड़े निर्णय लेना लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ है। शिक्षा जैसे क्षेत्र में एकतरफा नीतियां समाज को जोड़ने के बजाय उसे तोड़ने का काम करेंगी।"
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस बिल को मौजूदा स्वरूप में लागू किया गया, तो इसके दूरगामी और नकारात्मक परिणाम सामने आएंगे, जिससे आने वाली पीढ़ियों का शैक्षणिक आधार कमजोर हो सकता है।
संस्थानों और छात्रों पर पड़ता प्रतिकूल प्रभाव
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता के अनुसार, नए नियमों से स्वायत्तता (Autonomy) के नाम पर शैक्षणिक संस्थानों पर सरकारी नियंत्रण बढ़ने की आशंका है। उन्होंने मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदुओं पर चिंता जताई:
शिक्षा के अधिकार का हनन: नए प्रावधानों से छात्रों और शिक्षकों के अधिकारों में कटौती हो सकती है।
अस्थिरता का माहौल: कानूनों के इस नए स्वरूप से देश के विश्वविद्यालयों में टकराव और अस्थिरता की स्थिति पैदा हो सकती है।
सामाजिक सौहार्द को खतरा: सिद्धार्थ सिंह का मानना है कि इन नीतियों से शैक्षणिक परिसरों में असंतोष बढ़ेगा, जो सामाजिक सद्भाव के लिए एक गंभीर चुनौती बन सकता है।
"लोकतंत्र विरोधी नीतियां इस देश में स्वीकार्य नहीं हैं। शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में जनसंवाद को दरकिनार करना देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने जैसा है।" — सिद्धार्थ सिंह, अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट
व्यापक बहस की मांग
अधिवक्ता ने स्पष्ट किया कि देश की शिक्षा व्यवस्था को किसी भी प्रकार के गहरे संकट से बचाने के लिए पारदर्शिता अनिवार्य है। उन्होंने केंद्र सरकार से अपील की है कि UGC बिल पर जल्दबाजी में निर्णय लेने के बजाय इसे ठंडे बस्ते में डाला जाए और इस पर देशव्यापी बहस (Public Debate) आयोजित की जाए।
वर्तमान में, जहाँ एक ओर सरकार इन बदलावों को 'सुधार' बता रही है, वहीं सिद्धार्थ सिंह जैसे कानूनी विशेषज्ञों की यह कड़ी प्रतिक्रिया आने वाले समय में एक बड़े कानूनी और सामाजिक संघर्ष का संकेत दे रही है। अब देखना यह होगा कि क्या सरकार इस विरोध को संज्ञान में लेकर चर्चा के द्वार खोलती है या नहीं।
