मई का महीना तकनीकी रूप से वह समय है जब सूरज की तपिश अपने चरम पर होनी चाहिए, लेकिन इस वर्ष का घटनाक्रम किसी डरावनी फिल्म के दृश्य जैसा है। एक तरफ राजस्थान, दिल्ली और मध्य प्रदेश के कुछ अंचल 48 डिग्री सेल्सियस के साथ 'आग के दरिया' बने हुए हैं, तो दूसरी तरफ कई शहरों में आसमान से बर्फ के गोले (ओले) बरस रहे हैं। एक ही देश, एक ही पखवाड़ा और मौसम के दो विपरीत छोर। यह महज ऋतु-चक्र का विचलन नहीं है; यह उस संतुलन का ध्वस्त होना है जिसे प्रकृति ने लाखों वर्षों में बनाया था।
'जैसा करोगे, वैसा भरोगे' का वैश्विक हिसाब
बचपन में सुनी गई यह कहावत अक्सर मानवीय रिश्तों के संदर्भ में कही जाती थी, लेकिन आज यह पारिस्थितिक (Ecological) हकीकत बन चुकी है। दशकों तक हमने विकास के नाम पर प्रकृति के साथ जो खिलवाड़ किया, कुदरत अब उसका हिसाब 'ब्याज समेत' वसूल रही है।
हाल ही में ऋषिकेश के पावन तट पर आचार्य प्रशांत ने इस संकट के मूल केंद्र पर चोट करते हुए एक गहरी बात कही। उन्होंने स्पष्ट किया कि:
"क्लाइमेट क्राइसिस (जलवायु संकट) केवल बाहर बढ़ते तापमान की समस्या नहीं है, बल्कि यह हमारे भीतर बढ़ती 'अतृप्त इच्छाओं' और 'जीवनशैली' का संकट है।"
समस्या यह है कि हमने अपनी जरूरतों को 'लालच' में बदल लिया है। हमारा खान-पान, अंधाधुंध खरीदारी, अनावश्यक यात्राएं और बर्बादी की संस्कृति—ये सब मिलकर पर्यावरण की नींव खोद रहे हैं। जब तक "और चाहिए" की अंधी दौड़ नहीं थमेगी, तब तक अंतरराष्ट्रीय समझौते और सरकारी नीतियां केवल कागजी दस्तावेज बनकर रह जाएंगी।
विज्ञान की चेतावनी और हमारी उदासीनता
दुनिया ग्लोबल वार्मिंग की उस खतरनाक सीमा (1.5°C वृद्धि) के मुहाने पर खड़ी है, जिसकी चेतावनी वैज्ञानिक पिछले 40 वर्षों से दे रहे हैं। रिपोर्टें आती हैं, वैश्विक सम्मेलन (COP) होते हैं, भारी-भरकम भाषण दिए जाते हैं, लेकिन धरातल पर सन्नाटा है। कारखानों का धुआं और जंगलों की कटान बदस्तूर जारी है।
अक्सर हम आम नागरिक यह सोचकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि यह सरकारों या बड़े उद्योगपतियों की जिम्मेदारी है। लेकिन क्या सच में ऐसा है?
सिंगल यूज प्लास्टिक का हमारा मोह।
जरूरत न होने पर भी जलती लाइटें और एसी।
हर साल नया गैजेट या फोन खरीदने की सनक।
भोजन की बर्बादी और विलासितापूर्ण पर्यटन।
ये छोटे-छोटे व्यक्तिगत फैसले ही मिलकर उस 'विनाशकारी पदचिह्न' (Carbon Footprint) का निर्माण करते हैं, जो आज मौसम को बेकाबू कर रहा है।
परंपरा बनाम आधुनिक बाजार
हमारे पूर्वजों के पास प्रकृति के साथ जीने का एक 'संयम शास्त्र' था। गांवों में कुएं से उतना ही पानी निकाला जाता था जितनी प्यास हो। खेतों को पुनर्जीवित होने के लिए खाली छोड़ा जाता था। लेकिन आज, बाज़ार हमारी इच्छाएं तय करता है। विज्ञापनों ने हमें यह विश्वास दिला दिया है कि हम उपभोग के बिना अधूरे हैं।
पर्यटन का बदलता स्वरूप इसका सबसे वीभत्स उदाहरण है। आज हिमालय के पहाड़ शांति के लिए नहीं, बल्कि ट्रैफिक जाम, कचरे और शोर के लिए जाने जाते हैं। मनाली, शिमला और ऋषिकेश जैसे संवेदनशील क्षेत्र मानवीय दबाव से कराह रहे हैं।
चेतावनी हकीकत बनने से पहले...
वैज्ञानिक शब्दावली में मई में ओले गिरने जैसी घटनाओं को 'एक्सट्रीम वेदर इवेंट्स' कहा जाता है। यह अब केवल भारत की समस्या नहीं है; यूरोप के जंगलों की आग और अफ्रीका का भीषण सूखा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। धरती बीमार है और इसका इलाज केवल नई तकनीक या सौर पैनलों से संभव नहीं है। इसका वास्तविक समाधान हमारी 'चेतना' में छिपा है।
हमें खुद से कुछ कड़वे सवाल पूछने होंगे:
क्या हमें वाकई इतने संसाधनों की आवश्यकता है?
क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को एक ऐसा ग्रह सौंपना चाहते हैं जहां हवा जहरीली और मौसम अनिश्चित हो?
क्या हम 'सुविधा' के लिए 'अस्तित्व' की बलि देने को तैयार हैं?
बदलाव किसी सरकारी आदेश का इंतजार नहीं करेगा। इसे हमारे रसोईघर, हमारी आदतों और हमारे दैनिक निर्णयों से शुरू होना होगा। जब मई में ओले पड़ें, तो उसे कुदरत का करिश्मा नहीं, उसकी 'चीख' समझिए। याद रखिए, चेतावनियां हमेशा नहीं आतीं; एक समय के बाद वे स्थायी हकीकत बन जाती हैं।
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| कुलविंदर सिंह |

