भारत को साफ रखने की बात हर कोई करता है, लेकिन सच यह है कि गंदगी सिर्फ सड़कों पर नहीं, हमारी सोच में भी बस गई है। हम अपने घर को साफ रखते हैं, मंदिर-गुरुद्वारे जाते समय नहा-धोकर जाते हैं, लेकिन घर से बाहर निकलते ही सड़क पर कचरा फेंकने में बिल्कुल नहीं सोचते।
रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, बाजार और नदी किनारे — हर जगह यही हाल दिखाई देता है। लोग पानी की बोतल, चिप्स के पैकेट, प्लास्टिक और पूजा का सामान खुले में फेंक देते हैं। बाद में वही लोग कहते हैं कि देश गंदा है और सरकार कुछ नहीं कर रही।
"जब तक घर के बाहर की जगह को 'सरकारी' समझा जाता रहेगा, तब तक डस्टबिन भी कम पड़ेंगे। असली सफाई झाड़ू से नहीं, अपनी जिम्मेदारी समझने से शुरू होती है।"
दुनिया के कई देशों में लोग खुद सफाई का ध्यान रखते हैं। जापान में लोग अपना कचरा खुद उठाकर घर ले जाते हैं। सिंगापुर में लोग सड़क पर गंदगी फैलाने से बचते हैं क्योंकि वहाँ सफाई को आदत बनाया गया है। यह आदत बचपन से सिखाई जाती है। हमारे यहाँ समस्या यह है कि लोग अपने घर तक ही सफाई को जरूरी मानते हैं। जो चीज सबकी होती है, उसकी जिम्मेदारी कोई लेना नहीं चाहता।
धर्म, आस्था और व्यवहार
स्वच्छ भारत अभियान के तहत करोड़ों रुपए खर्च किए गए, लेकिन सिर्फ योजना बनाने से बदलाव नहीं आता। हर धर्म में सफाई को महत्व दिया गया है:
इस्लाम: सफाई को 'आधा ईमान' कहा गया है।
हिंदू धर्म: पवित्रता और शुद्धि को ईश्वर भक्ति के समान माना गया है।
सिख धर्म: सेवा और सफाई (कार सेवा) को सर्वोच्च सम्मान दिया जाता है।
इसके बावजूद धार्मिक स्थलों के बाहर कचरे के ढेर हमारी कथनी और करनी के अंतर को उजागर करते हैं।
शुरुआत हमसे ही
जरूरत इस बात की है कि सफाई की शुरुआत घर से की जाए। बच्चों को छोटी उम्र से ही जिम्मेदारी की सीख दी जाए। अगर कोई सड़क पर कचरा फेंकता है, तो उसे प्यार से समझाया जाए। देश को साफ बनाना है तो सिर्फ सरकार नहीं, हर नागरिक को बदलना होगा। क्योंकि भारत की असली सफाई सड़क से पहले सोच में जरूरी है।
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| कुलविंदर सिंह (वरिष्ठ पत्रकार) |

