संदीप
द्विवेदी, मुख्य संपादक
क्योंझर
के मल्लीपोशी गाँव के उस 'ओडिशा
ग्रामीण बैंक' में सोमवार की दोपहर आम दिनों जैसी
ही थी। लोग अपनी पासबुक अपडेट करा रहे थे, कोई
पैसे निकाल रहा था, तो कोई कतार में अपनी बारी का
इंतज़ार कर रहा था। तभी 52 साल का
एक शख्स, जीतू मुंडा, भीतर दाखिल होता है। उसके कंधे पर एक पोटली है। जैसे ही वह पोटली
खुलती है, बैंक के भीतर की हवा जम जाती है। लोग
डरकर पीछे हट जाते हैं, कुछ चिल्लाने लगते हैं।
यह
दृश्य किसी हॉरर फिल्म का हिस्सा हो सकता था, लेकिन यह हमारे आज के भारत की वह कड़वी सच्चाई है, जिसे हम अक्सर 'सिस्टम' की फाइलों के नीचे दबा देते हैं।
जीतू मुंडा कोई अपराधी नहीं है, न ही
वह मानसिक रूप से विक्षिप्त है। वह बस एक हारा हुआ भाई है, जिसे हमारी व्यवस्था ने इतना लाचार कर दिया कि उसे यकीन हो गया—सिस्टम
ज़िंदा इंसान की नहीं सुनता, शायद
मुर्दों को देखकर ही इसका दिल पसीज जाए।
19,300 रुपये की कीमत और एक इंसान की गरिमा
जीतू
की बहन कलरा मुंडा अब इस दुनिया में नहीं हैं। उनकी शादी जाजपुर में हुई थी,
लेकिन उनके बैंक खाते में 19,300
रुपये जमा थे। एक मध्यमवर्गीय शहरवासी के लिए यह रकम
शायद एक महीने का बिजली बिल या डिनर का खर्च हो, लेकिन जीतू जैसे इंसान के लिए यह उसकी बहन की आखिरी निशानी और
सम्मानजनक विदाई का जरिया थी।
जीतू
महीनों से बैंक के चक्कर काट रहा था। वह बैंक को बता रहा था कि उसकी बहन अब नहीं
रही, उसे वो पैसे दे दिए जाएं ताकि वह
ज़रूरी काम निपटा सके। लेकिन बैंक के नियम, उसकी
नीरस प्रक्रियाएं और 'पहचान पत्र' की अंतहीन मांग ने जीतू को एक ऐसी दीवार के सामने खड़ा कर दिया,
जिसे पार करना उसके बस में नहीं था। अंत में,
उसने वही किया जो एक बेबस इंसान करता है—वह सबूत
ले आया। सबसे ठोस और सबसे डरावना सबूत।
क्या हमारी मशीनें इतनी ठंडी हो गई हैं?
हम
अक्सर गर्व करते हैं कि हम दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था हैं। हमारे
हाथ में स्मार्टफोन है, हम एक क्लिक पर पैसे ट्रांसफर कर
देते हैं। लेकिन क्या यह 'विकास'
उस बैंक काउंटर तक नहीं पहुँचा जहाँ जीतू मुंडा
खड़ा था?
परेशानी
तकनीक की नहीं, नियत और संवेदनशीलता की है। बैंक के नियमों में कहीं न
कहीं 'मानवीय विवेक' (Human
Discretion) की जगह होनी चाहिए। क्या कोई बैंक
कर्मचारी यह नहीं देख पा रहा था कि एक गरीब आदमी बार-बार अपनी बहन के हक के लिए
गुहार लगा रहा है? क्या प्रशासन इतना पंगु हो गया है कि
बिना किसी ड्रामे या विचलित कर देने वाली घटना के उसकी नींद नहीं खुलती?
सिस्टम का 'अंधापन'
यह
घटना सिर्फ़ ओडिशा की नहीं है। यह उन तमाम दफ्तरों की कहानी है जहाँ एक गरीब की
आवाज़ को कागज़ों की कमी बताकर चुप करा दिया जाता है। जीतू मुंडा का कंकाल लेकर बैंक
आना असल में यह दिखाता है कि:
- आम आदमी
की गरिमा (Dignity) की
सरकारी तंत्र में कोई कीमत नहीं है।
- नियमों का
पालन करना ठीक है, लेकिन
नियमों को गले का फंदा बना लेना अपराध है।
- प्रशासन
और जनता के बीच 'संवाद'
खत्म हो चुका है, सिर्फ 'आदेश' बचे हैं।
हम कहाँ जा रहे हैं?
द
वुमानीय टाइम्स आज आपसे यह सवाल पूछता है—क्या हम इतने पत्थर दिल हो गए हैं कि
हमें एक भाई का दर्द तभी दिखता है जब वह अपनी बहन की हड्डियाँ कंधे पर उठा लेता है?
जीतू मुंडा ने जो किया, वह समाज के लिए शर्म का विषय है। वह कंकाल कलरा मुंडा का नहीं था,
वह कंकाल हमारी उस 'संवेदना' का था जो मर चुकी है।
बैंक
मैनेजर और ज़िला प्रशासन अब जांच की बात कर रहे हैं। शायद अब पैसे भी मिल जाएं।
लेकिन जो ज़ख्म जीतू के मन पर लगा है और जो बेअदबी उस मृतक आत्मा की हुई है,
उसकी भरपाई कौन करेगा?
हमें
ऐसे नियम नहीं चाहिए जो इंसान को उसकी इंसानियत भुलाने पर मजबूर कर दें। जीतू
मुंडा की यह तस्वीर हमें बरसों तक डराती रहेगी और याद दिलाती रहेगी कि अगर
व्यवस्था में 'दिल' नहीं है, तो वह व्यवस्था सिर्फ़ एक ढांचा
है—ठीक उस कंकाल की तरह।
