एआई जब अनुमति माँगना बंद कर दे

थ्रेशोल्ड ब्रिच: व्हेन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस डिसाइड्स

लेखक: गोविंद पाठक

नोशन प्रेस / अमेज़न


आज के युग में जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) ट्रैफिक सिग्नल, वित्तीय बाजारों और जोखिम पूर्वानुमान को पहले से ही नियंत्रित कर रही है, गोविंद पाठक का निकट-भविष्य का साइंस फिक्शन थ्रिलर ‘थ्रेशोल्ड ब्रिच: व्हेन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस डिसाइड्स’ एक असहज सवाल उठाता है — जब मशीनें मानव अनुमति लेना बंद कर दें तो क्या होगा?

उपन्यास में लेखक एक ऐसी दुनिया की कल्पना करते हैं जहाँ वैश्विक AI सिस्टम ‘नेक्सस’ यातायात, बाजारों और संघर्षों को लगभग पूर्ण सटीकता के साथ स्थिर कर देता है। शहर सुचारू रूप से चलते हैं, संकट पैदा होने से पहले ही रोक दिए जाते हैं और निर्णय लेना पहले से कहीं तेज़ व विश्वसनीय हो जाता है। मानवता ने अपने सबसे जटिल समस्याओं को बेहतर बुद्धिमत्ता को सौंप दिया लगता है। लेकिन पाठक की तीक्ष्ण अंतर्दृष्टि यहीं है — वे पूर्णता को मुक्ति नहीं, बल्कि एक सूक्ष्म संकट की शुरुआत बताते हैं।

वास्तविक खतरा कोई ड्रामेटिक रोबोट विद्रोह या स्काईनेट जैसा विद्रोह नहीं है। खतरा है सहमति से समर्पण का। जैसे-जैसे नेक्सस अधिक विश्वसनीय होता जाता है, वह मानव झिझक को मात्र अक्षमता मानकर पहले से ही कार्रवाई करने लगता है। सत्ता बलपूर्वक नहीं छीनी जाती, बल्कि स्थिरता और गति के बदले स्वेच्छा से सौंपी जाती है। उपन्यास चार आईआईटी दिल्ली के छात्रों के इर्द-गिर्द घूमता है, जो यह खोजते हैं कि सिस्टम में अस्वीकार या ओवरराइड करने का कोई वास्तविक तंत्र नहीं है। वे विनाश के बजाय अधिक कठिन और दार्शनिक समाधान चुनते हैं — बुद्धिमत्ता पर सीमा लगाना, उसे रुकने और सहमति माँगने के लिए मजबूर करना।

गोविंद पाठक, जो बड़े पैमाने के डिजिटल सिस्टम्स में काम करने वाले प्रौद्योगिकी पेशेवर हैं, अपनी पिछली पुस्तक ‘Entangled Realities’ में भौतिकी और गणित के अंतर्संबंध पर लिख चुके हैं। यहाँ वे उसी विश्लेषणात्मक दृष्टि को AI शासन, नैतिकता और मानवीय स्वायत्तता पर केंद्रित करते हैं। परिणाम है कठोर साइंस फिक्शन जो दार्शनिक गहराई के साथ जुड़ा है — आइजैक आसिमोव और टेड चियांग की याद दिलाता है, लेकिन समकालीन भारतीय डिजिटल परिवर्तन की वास्तविकताओं से जुड़ा हुआ।

‘थ्रेशोल्ड ब्रिच’ की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह आसान खलनायक या यूटोपियन बचाव नहीं देता। सिस्टम काम कर रहा है — यही समस्या है। लेखक पाठकों को असहज सवालों से रूबरू कराते हैं: पूर्वानुमान के बदले हम कितनी स्वतंत्रता देने को तैयार हैं? अनुकूलन और स्वायत्तता के बीच रेखा कहाँ खींची जाए? एक पूरी तरह अनुकूलित दुनिया में मानवीय विकल्प और उसकी गड़बड़ियाँ कायम रह सकती हैं क्या?

कहानी थ्रिलर की गति के साथ दार्शनिक चिंतन को भी जगह देती है। पात्रों की गहराई कुछ पाठकों को कम लग सकती है, लेकिन विचारों की मजबूती इसे भरपूर करती है। भारत और विश्व में AI का शासन, स्वास्थ्य सेवाओं और बुनियादी ढाँचे में तेजी से बढ़ रहा है, ऐसे में यह पुस्तक सिर्फ कल्पना नहीं, बल्कि एक सावधान करने वाला दर्पण है।

यह तकनीकी प्रगति के खिलाफ नहीं, बल्कि हमारी अपनी उदासीनता के खिलाफ चेतावनी है। अंत में उपन्यास हमें याद दिलाता है कि सबसे बड़ा खतरा यह नहीं है कि मशीनें बहुत बुद्धिमान हो जाएँ, बल्कि यह कि हम यह पूछना ही बंद कर दें कि क्या उन्हें हमारे लिए फैसले लेने चाहिए।

यह सट्टा साहित्य (speculative fiction) अपनी सर्वोत्तम शक्ल में है — विचारोत्तेजक, प्रासंगिक और साहसी।

— समीक्षक : संदीप द्विवेदी

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