जिसे शत्रु माना, वही तुम्हारी ढाल है

जो प्यारी है सिर्फ तुम्हारी है तुम्हारे हर सुख-दुख में सदैव तुम्हारे साथ है तुम्हारे आगे और पीछे ढाल बन कर खड़ी है ।उसे ही तुम अपना शत्रु माने बैठे हो बस!एक बार प्यार से उसे अपना समझकर ,उसे गले लगाकर तो देखो ना । इसकी शुरुआत स्वयं अपने हृदय के एक छोटे से कोने से करके देखो ना । 

फिर क्या आनन्द है उस जीवन का जिसमें सफलताओं के शिखर पर पहुँचने से तुम्हें, कोई न रोक पाता जो सफलता अनंत वर्षों बाद मिली वह शायद उन्मेष काल में हीं मिल जाता ।यह भी जीवन की विडंबना हीं है जिसे हम अंत काल में समझते हैं और कुछ तो ऐसे बदनसीब होते हैं जो इससे भी वंचित रह जाते हैं। बस ! पैसे कमाने की होड़ में जीवन के हर सुख से विमुख हो जाते हैं ।स्मृति में आलिंगन के वह पल भी विस्मृत हो जाते है। नव ऊर्जा,नव चेतना से हृदय के स्पंदन को तुम विशाल क्षितिज पर अंकित करके देखो ना, इसकी भी शुरुवात एक बार अपने घर से करके देखो ना ।

हम बाहर सदैव सबसे तो लड़ते हैं। दोनों को- (लड़का - लड़की) एक समान हीं कहते हैं। हैं। पर इसकी भी एक शुरुआत बस!एक बार अपने घर से भी करके देखो ना ।

यह दुनिया बहुत हीं सुंदर है,प्यारी है बस!सबको एक बार स्वयं महसूस करके देखो ना। इसकी शुरुआत स्वयं अपने घर से करके देखो ना ….स्वयं अपने घर से करके देखो ना…..।

डॉ. रानी कुमारी 

हिंदी अध्यापिका, के आर मंगलम वर्ल्ड स्कूल, जी के -१, नई दिल्ली ।






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