श्री अरबिंदो सेंटर फॉर आर्ट्स एंड क्रिएटिविटी ने मनाई प्रसिद्ध फिल्मकार ऋत्विक घटक की जन्मशताब्दी

श्री अरबिंदो सोसाइटी की एक पहल, श्री अरबिंदो सेंटर फॉर आर्ट्स एंड क्रिएटिविटी ने प्रसिद्ध फिल्मकार ऋत्विक घटक की जन्मशताब्दी का उत्सव मनाया। यह आयोजन सेंटर के ट्वाइलाइट फिल्म क्लब के तत्वावधान में हुआ, जिसमें घटक की पहली फिल्म नागरिक  का विशेष प्रदर्शन किया गया। इस कार्यक्रम का क्यूरेशन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार विजेता फिल्मकार शंखजीत डे ने किया।

प्रदर्शन के बाद जानी मानी सिनेविद् प्रो. इरा भास्कर और डॉ. अनुज्ञान नाग ने फिल्म पर गहन चर्चा की।

फिल्म की शुरुआत से पहले, सिनेविद् डॉ. अनुज्ञान नाग, जो जामिया मिलिया इस्लामिया के .जे.के. मास कम्युनिकेशन रिसर्च सेंटर में फिल्म, मीडिया एवं सांस्कृतिक अध्ययन पढ़ाते हैं, ने कहा

अपनी पहली फिल्म के रूप में नागरिक घटक की विस्थापितों के प्रति गहरी संवेदना और साधारण नागरिक के गरिमा के संघर्ष को दर्शाती है। नागरिक को देखना मानो उस सिनेमाई आवाज़ के जन्म का साक्षी बनना है जिसने निजी पीड़ा को सामूहिक स्मृति में रूपांतरित किया।

प्रदर्शन के बाद प्रो. इरा भास्कर की संपादित, व्याख्यायित और प्रस्तावना-युक्त पुस्तक ‘Ritwik Ghatak's Partition Quartet: The Screenplays: Volume 1 – Nagarik’ पर चर्चा हुई।
 
उन्होंने कहा

जहाँ मेघे ढाका तारा (1960), कोमल गांधार (1961) और सुवर्णरेखा (1962) को घटक की विभाजन त्रयी के रूप में जाना जाता है, वहीं नागरिक की कथा उन विस्थापित लोगों के बारे में है जिन्हेंनागरिककहकर संबोधित किया गयाइस प्रकार ये चारों फिल्में मिलकर त्रयी नहीं बल्कि क्वार्टेट बनाती हैं।

प्रो. इरा भास्कर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड एस्थेटिक्स में सिनेमा स्टडीज़ की पूर्व प्रोफेसर रही हैं। वह ऋत्विक घटक की प्रमुख अध्येता हैं और उन्होंने बॉम्बे सिनेमा की इस्लामिक संस्कृतियों और उसके उद्योग पर व्यापक रूप से लेखन किया है।


कार्यक्रम
के क्यूरेटर शंखजीत डे ने कहा

ऋत्विक घटक का सिनेमा भारतीय फिल्मों के परिदृश्य पर अमिट छाप छोड़ता है। उनकी फिल्में निर्माण की दृष्टि से भले ही साधारण हों, लेकिन उनकी सिनेमाई रचनात्मकता में गहराई और तीव्रता दोनों झलकती हैं। हम उनकी शताब्दी को केवल फिल्म प्रदर्शन तक सीमित नहीं रखना चाहते थे, बल्कि उनके सिनेमा और उसकी विरासत पर गहन चर्चा के माध्यम से मनाना चाहते थे।

चर्चा से एक प्रमुख निष्कर्ष यह उभरा कि नागरिक भारतीय फिल्म इतिहास में एक आकर्षक क्या होता अगर (What if) की संभावना प्रस्तुत करती है।
 
यदि यह फिल्म 1952 में, सत्यजीत रे की पाथेर पांचाली से पहले रिलीज़ हो जाती, तो भारतीय कला सिनेमा का इतिहास शायद अलग होताऔर घटक को अपने जीवनकाल में ही एक महत्वपूर्ण भारतीय ऑटर (Auteur) के रूप में मान्यता मिल जाती।

 

एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने