सत्ता की दहलीज पर दम तोड़ती निष्पक्षता: भारतीय प्रेस का एक आत्मघाती दौर

संदीप द्विवेदी

3 मई को 'विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस' मनाना अब एक रस्म अदायगी जैसा लगने लगा है। एक पत्रकार के तौर पर, जब मैं न्यूज़रुम के बदलते माहौल और सड़कों पर रिपोर्टिंग करते साथियों की सुरक्षा को देखता हूँ, तो यह सवाल कौंधता है कि क्या हम वाकई स्वतंत्र हैं? भारत जैसे जीवंत लोकतंत्र में प्रेस की स्वतंत्रता अब 'संवैधानिक गारंटी' से सिमटकर 'सत्ता की अनुमति' तक रह गई है।



'सॉफ्ट सेंसरशिप' का अदृश्य जाल

1975 के आपातकाल में सेंसरशिप प्रत्यक्ष थी—अखबारों के पन्ने खाली छूटते थे। लेकिन आज की सेंसरशिप 'अदृश्य' और 'परिष्कृत' है। इसे हम 'सॉफ्ट सेंसरशिप' कह सकते हैं।

  • संपादकीय स्वायत्तता का पतन: अब खबरें सरकारी दफ्तरों से नहीं, बल्कि मीडिया मालिकों के 'बिजनेस इंटरेस्ट' से तय होती हैं। जब मीडिया घराने कोयला, बिजली या बंदरगाहों के कारोबार में शामिल होते हैं, तो वे सरकार के खिलाफ एक शब्द भी छापने का साहस खो देते हैं।

  • न्यूज़रुम में 'डर' का मनोविज्ञान: आज पत्रकारों के भीतर एक 'इंटरनल सेंसर' बैठ गया है। लिखने से पहले यह सोचा जाता है कि "क्या इस खबर से सत्ता नाराज होगी?" या "क्या मुझ पर FIR होगी?" यह आत्म-सेंसरशिप किसी भी कानूनी प्रतिबंध से ज्यादा खतरनाक है।

कानूनी हथियारों का 'रणनीतिक' उपयोग

लोकतंत्र में कानून रक्षा के लिए होते हैं, लेकिन हाल के वर्षों में इन्हें 'चुप कराने के औजार' की तरह इस्तेमाल किया गया है:

  • UAPA और PMLA का प्रहार: आतंकवाद विरोधी कानूनों का उपयोग उन पत्रकारों पर किया जा रहा है जो ज़मीनी हकीकत दिखाते हैं। सिद्दीकी कप्पन (हाथरस कांड) और गौतम नवलखा जैसे मामले इसी श्रेणी में आते हैं। यहाँ 'बेल नहीं, जेल' ही संदेश है।

  • कश्मीरी प्रेस की घेराबंदी: कश्मीर में 'फहद शाह' और 'साजिद हाशमी' जैसे पत्रकारों की गिरफ्तारियां यह दर्शाती हैं कि संघर्ष वाले क्षेत्रों में सच बोलना अब 'राष्ट्र विरोधी' गतिविधि करार दिया जा सकता है।

हटा दी गई खबरें और 'डिजिटल डार्कनेस'

सूचना के अधिकार पर प्रहार अब डिजिटल माध्यमों से हो रहा है:

  • BBC डॉक्यूमेंट्री मामला: प्रधानमंत्री पर बनी डॉक्यूमेंट्री को IT रूल्स की आपातकालीन शक्तियों का उपयोग करके प्रतिबंधित करना, सूचना के मुक्त प्रवाह पर सीधा प्रहार था।

  • मीडिया संस्थानों पर छापे: जब दैनिक भास्कर ने गंगा किनारे दफन लाशों की रिपोर्टिंग की, या जब NewsClick ने किसानों के मुद्दों को उठाया, तो उनके दफ्तरों पर ED और आयकर विभाग के छापे पड़े। संदेश साफ था: "यदि आप सरकार के नैरेटिव को चुनौती देंगे, तो एजेंसियां आपके दरवाजे पर होंगी।"

 'स्वतंत्र पत्रकारिता' का संघर्ष

विश्लेषण का सबसे दुखद पहलू पत्रकारिता का दो धड़ों में बंटना है।

  • एक बड़ा हिस्सा (मुख्यधारा मीडिया) आज 'प्रवक्ता' की भूमिका में है। वे जनता की तरफ से सरकार से सवाल नहीं पूछते, बल्कि सरकार की तरफ से विपक्ष और जनता को ही कठघरे में खड़ा करते हैं।

  • इसके विपरीत, छोटे और स्वतंत्र डिजिटल पोर्टल्स (जैसे The Wire, Scroll, Article 14) आर्थिक तंगी और कानूनी मुकदमों के बावजूद मशाल थामे हुए हैं। लेकिन इन पर भी विदेशी फंडिंग के नाम पर नकेल कसी जा रही है।

पत्रकारों की शारीरिक असुरक्षा

भारत उन देशों की सूची में शामिल है जहाँ पत्रकारों के लिए खतरा सबसे अधिक है।

  • गौरी लंकेश से लेकर सुदीप दत्ता भौमिक तक, कलम की धार को गोली से कुचलने का प्रयास किया गया।

  • छोटे शहरों के पत्रकार जो अवैध खनन या शराब माफिया पर लिखते हैं, वे बिना किसी सुरक्षा के 'डेथ वारंट' लेकर घूम रहे हैं।

क्या रास्ता बचा है?

एक पत्रकार के रूप में मेरा यह विश्लेषण कड़वा लग सकता है, लेकिन यह सच है कि "प्रेस की आजादी तब तक वापस नहीं आएगी जब तक पाठक सच की कीमत चुकाने को तैयार न हो।"

जब तक जनता 'मुफ्त' की खबरों और 'मनोरंजक' बहसों के जाल में फंसी रहेगी, मीडिया घराने सत्ता के हाथों बिकते रहेंगे। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को बचाने की जिम्मेदारी अब केवल पत्रकारों की नहीं, बल्कि उन नागरिकों की भी है जिनका यह हक है कि उन्हें 'सच्चाई' पता चले, 'प्रोपेगेंडा' नहीं।

3 मई को हमें सिर्फ प्रेस की आजादी को याद नहीं करना चाहिए, बल्कि उस पत्रकारिता को पुनर्जीवित करने का संकल्प लेना चाहिए जो सत्ता के सामने बेखौफ खड़ी हो सके।

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